भारत में धरोहर संरक्षण और पर्यावरण विधि: कागजी आदेशों से धरातलीय हकीकत तक का सफर

भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक चेतना पाषाण और शिलाओं में गढ़ी गई अपनी ऐतिहासिक वास्तुकला में सांस लेती है। जब हम श्वेत संगमरमर से तराशे गए ताजमहल, जिसके बारे मे कई हिन्दू ये भी दावा करते हैं की वो तेजो महालय नामक हिन्दू मंदिर हैं[1], उस विरासत को देखते हैं, अथवा कोणार्क के सूर्य मंदिर की नक्काशीदार दीवारों, खजुराहो के बलुआ पत्थर के विग्रहों और हम्पी के विजयनगर साम्राज्य के पाषाण स्तंभों का अवलोकन करते हैं, या कभी अजंता की गुफाओं सुंदर म्यूरल चित्रकला और शिलाओं से बनी मूर्तियाँ देखते हैं, तो वे केवल अतीत की स्थापत्य कला के अवशेष मात्र नहीं दिखते, बल्कि वे हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व के जीवित प्रतीक प्रतीत होते हैं। किंतु विगत कुछ दशकों में देश के कोने-कोने में अनियंत्रित रूप से बढ़ते औद्योगिक, नगरीय और वायुमंडलीय प्रदूषण ने इन अमूल्य धरोहरों के अस्तित्व पर एक अत्यंत गंभीर पारिस्थितिक संकट खड़ा कर दिया है। हवा में घुलती विषैली गैसें, अम्लीय वर्षा, सूक्ष्म धूलकण और जल स्रोतों का सूखना सदियों पुराने अवशेषोको रासायनिक और भौतिक रूप से नष्ट कर रहे हैं।[2] यह चिंताजनक स्थिति केवल पुरातात्विक क्षरण की बीती बात नहीं कहती, बल्कि हमारे देश की विधिक और प्रशासनिक व्यवस्था के समक्ष कई तीखे सवाल खड़े करती है।

भारत में धरोहर संरक्षण और पर्यावरण न्यायशास्त्र के अंतर्संबंधों का औपचारिक इतिहास लगभग पांच दशक पूर्व शुरू हुआ था ताज महल (इस आर्टिकल सीरीज मे “ताज महल” के नाम से ही उक्त स्थान का उल्लेख किया जाएगा क्यू की अभीतक इसके पऊपर कोई आधिकारिक जांच नहीं हुई हैं और ये मामला कोर्ट रिकार्ड मे कही दबा दिया गया हैं।[3]) से शुरू हुआ था। वर्ष 1977 में प्रस्तुत डॉ. एस. वरदराजन समिति की विशेषज्ञ रिपोर्ट देश का वह शुरुआती वैज्ञानिक दस्तावेज बनी, जिसने एक प्रस्तावित तेल शोधक कारखाने (ऑइल रीफायनरी) से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड के खतरे को भांपते हुए ताज महल के धरोहर सुरक्षा की वैज्ञानिक नींव रखी थी। इस रिपोर्ट के अनुसार यह प्रमाणित हो चुका था कि वायुमंडलीय प्रदूषण संगमरमर को स्टोन कैंसर जैसी रासायनिक विकृति में बदल सकता है।[4] इसके लगभग दो दशक बाद, वर्ष 1996 में उच्चतम न्यायालय ने एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक न्यायिक विवाद में 10,400 वर्ग किलोमीटर के ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन (TTZ) की स्थापना की और सैकड़ों उद्योगों को कोयला छोड़कर स्वच्छ गैस अपनाने या स्थानांतरित होने का कठोर आदेश दिया गया। न्यायालय ने यह ऐतिहासिक सिद्धांत स्थापित किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मिलने वाला स्वच्छ पर्यावरण का मौलिक अधिकार राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहरों को प्रदूषण-मुक्त परिवेश देने के दायित्व को भी अपने भीतर समेटे हुए है।[5] हम तुरंत अधिकारों की बात करते हैं पर कर्तव्य के बारे मे भूल जाते हैं। ताज महल की केस हो या अन्य किसी धरोहर का संरक्षण का मामला, अधिकार सबको याद आते हैं पर उस जगह को गंदा करते समय हम हमारा कर्तव्य, जिसे आजकल सिविक सेंस कहा जाता हैं, वो भूल जाते हैं। सरकार किसी भी धरोहर की रक्षा के लिए जो करेगी, वो करेगी, पर एक उत्तरदायी नागरिक होने के नाते आप ऐसी जगहों पर जब जाते है तब वहा के नियमों का एवं सिविक सेंस का ध्यान अवश्य रखे और वैसे ही जिम्मेदारी से बर्ताव करें।

खैर अब विषय पर फिर से आते हैं। वास्तव मे इन युगांतरकारी न्यायिक आदेशों और कड़े प्रशासनिक प्रतिबंधों के बावजूद धरातलीय वास्तविकता आज भी अत्यंत विचलित करने वाली है। वर्ष 2013 में सीएसआईआर-नीरी द्वारा तैयार की गई व्यापक पर्यावरण प्रबंधन योजना (CEMP)[6] और वर्ष 2015 की 262वीं संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट[7] ने इस कटु सत्य को उजागर किया कि उद्योगों की चिमनियों पर नियंत्रण के बाद भी स्मारकों पर प्रदूषण का प्रभाव रुका नहीं है। प्रदूषण का स्वरूप बदल चुका है; अब अनियंत्रित वाहनों का काला धुआं, खुले में कचरा और बायोमास जलाना, निर्माण कार्यों की उड़ती धूल और सूखी तथा मैली हो चुकी नदियों के भीतर पनपने वाले कीड़ों का जैविक मल-मूत्र स्मारकों को लगातार मटमैला और पीला बना रहे हैं। वर्ष 2016 के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के संशोधित औद्योगिक वर्गीकरण और फिरोजाबाद क्लस्टर के स्रोत-प्रभाजन अध्ययनों ने यह प्रमाणित किया कि नियामक तंत्र और क्षेत्रीय वहन क्षमता के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है।[8] भले ही यह अध्ययन केवल ताज महल तक सीमित हैं पर ऐसा ही कुछ देशभर मे हर जगह हो रहा हैं और सभी के पीछे कम या ज्यादा स्तर पर यही कारण हैं जो इन विविध अध्ययनों द्वारा सामने आए हैं।

प्रशासनिक स्तर पर सबसे बड़ी त्रासदी यह रही है कि सरकारी तंत्र ने दीर्घकालिक और टिकाऊ बुनियादी ढांचे के निर्माण के बजाय केवल तदर्थ कमेटियां बनाने और फाइलों में जवाब दाखिल करने तक अपनी जिम्मेदारी सीमित रखी। भारत मे पेपर वर्क ही सबकुछ हो चुका हैं, धरातल पर वास्तव कुछ और ही हैं। वर्ष 2017 में पर्यावरण मंत्रालय की होता समिति की रिपोर्ट ने उजागर किया कि प्रतिबंधों के बावजूद अनधिकृत विस्तार और प्रतिबंधित ईंधनों का गुप्त उपयोग बेरोकटोक जारी रहा।[9] इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर (SPA) द्वारा वर्ष 2018 में दो विशाल खंडों में तैयार किया गया ऐतिहासिक विजन डॉक्यूमेंट और उत्तर प्रदेश सरकार की पार्ट-सी कार्ययोजना भी प्रशासनिक खींचतान के चलते अपेक्षित गति प्राप्त नहीं कर सकी।[10] योजनाओं, तकनीकी रिपोर्टों और सरकारी घोषणाओं की कोई कमी नहीं रही, किंतु धरातल पर क्रियान्वयन का अभाव आज भी धरोहरों के संरक्षण में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। 1996 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी आजतक ताजमहल जैसी धरोहर के बचाव के लिए बने नियमों के तहत उचित कार्यवाही कर प्रदूषण को कारण बननेवाले व्यक्तियों को दंडित नहीं किया गया हैं।

मेरी rinkutai.com इस वेबसाईट पर आज से एक नई लेख शृंखला इसी चार दशकों के कानूनी और तकनीकी संघर्ष के एक-एक दस्तावेज का गहन और निष्पक्ष विश्लेषण प्रस्तुत करती है। यह समझना अनिवार्य है कि जो चुनौतियां आज ताजमहल के परिवेश में दिखती हैं, वही संकट भारत के तमाम प्राचीन मंदिरों और पवित्र हिन्दू तीर्थ स्थलों पर भी मंडरा रहा है। यदि 1977 की वैज्ञानिक चेतावनियों से लेकर 2018 के विजन डॉक्यूमेंट्स तक के विधिक और तकनीकी अनुभवों को निष्पक्षता से नहीं समझा गया, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सुरक्षित नहीं रख पाएंगे। यह लेख शृंखला हिन्दी एवं अंग्रेजी मे प्रकाशित होगी, इसीलिए इस वेबसाईट को बुकमार्क कर लीजिए और हर रोज एक लेख अवश्य पढिए।

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[1] “The Taj Mahal Is Tejo-Mahalaya: A Shiva Temple”, Hare Krishna Temple Portal, available at: https://www.harekrsna.de/taj-mahal/tejo-mahalaya.html, last visited on 1.9.2026

[2] Ishan Garg, Louisa Tang, “India’s ancient monuments crumble under the weight of severe pollution, climate change”, CNA, Dt. 21.11.2025, available at: https://www.channelnewsasia.com/asia/india-ancient-monuments-climate-change-pollution-red-fort-taj-mahal-5482191 Last visited on 31.1.2026

[3] “Was Taj Mahal Originally Tejo Mahalaya? Allahabad HC Seeks Centre, ASI’s Response”, HW News English, YouTube, Dt. 7.7.2026, available at: https://www.youtube.com/watch?v=P1qMDEYq-P0, Last visited 1.9.2026

[4] “Expert Committee Report on Environmental Impact of Mathura Refinery”, Government of India, December 1977, Available at: http://www.ttzagra.com/docs/StudyReport/VARADHARAJAN%20COMMITTEE.pdf

[5] M. C. Mehta (Taj Trapezium Matter) Vs Union of India and Others, [(1997) 2 SCC 353] Dt. 30.12.1996, available at: http://www.ttzagra.com/docs/SupreemCourtOrders/Order%2030-12-1996.pdf

[6] “Comprehensive Environmental Management Plan (CEMP) For Taj Trapezium Zone (TTZ) Area”, CSIR-National Environmental Engineering Research Institute (NEERI), Nehru Marg, Nagpur – 440 020, December, 2013, available at: http://www.ttzagra.com/docs/StudyReport/Neeri_Report_Agra.pdf

[7] “Two Hundred and Sixtysecond Report on ‘Effects of Pollution on Taj’”, Department-related Parliamentary Standing Committee on Science & Technology, Environment & Forests, Dt. 13.7.2015 available at: http://www.ttzagra.com/docs/262%20P.S.C.%20Report.pdf

[8] “Final Document on Revised Classification of Industrial Sectors Under Red, Orange, Green and White Categories”, Central Pollution Control Board Dt. 29.2.2016 available at http://www.ttzagra.com/docs/Category%20of%20Ind.by%20CPCB.pdf

[9] “Report of the Committee related to Assessment of Industrial Pollution and Environmental Issues in Taj Trapezium Zone”, Ministry of Environment, Forest and Climate Change, Dt. 3.4.2017, available at: http://www.ttzagra.com/docs/StudyReport/HOTA%20COMMITTEE%20REPORT.pdf

[10] “Taj Trapezium Zone Preparation of Vision Document First Draft Volume I” School of Planning and Architecture, July 2018 available at: http://www.ttzagra.com/docs/draftvision/Volume_I_TTZ_Vision_Document_Draft_22_July_2018_Ver2.pdf;

“Taj Trapezium Zone Preparation of Vision Document First Draft Volume II” School of Planning and Architecture, July 2018 available at: http://www.ttzagra.com/docs/draftvision/Final_Volume_II_TTZ_Annexure_Vision_Document_Draft_23_July_2018_Ver1__1_.pdf;

“Part C Strategies Recommendation & Action Plan, Vision Document for Taj Trapezium Zone”, Government of Uttar Pradesh, Available at: http://www.ttzagra.com/docs/draftvision/Part-C%20(Vision%20Document).pdf

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