The Union has exclusive power for reasons connected with defense, foreign affairs, or the security of India (List I, Entry 9). Both the Union and States have concurrent power for reasons connected with the security of a State, maintenance of public order, or maintenance of supplies and services essential to the community (List III, Entry 3).
Case of tomb in High Court Premises: Part 2
The Article 49 of the Constitution of India specifies that it shall be the obligation of the State to protect every monument or place or object of artistic or historic interest, declared by or under law made by Parliament to be of national importance, from spoliation, disfigurement, destruction, removal, disposal or export, as the case may be.”
Case of tomb in High Court Premises: Part 1
1. Under Section 2(j) of the AMASR Act, respondents declared the said tomb and circular vault as ancient monument merely on account of its existence for more than 100 years. The said site does not fulfill any criteria of an ancient monument, as it contains only the remains of close person of the then former Governor. This site does not have any historical, archaeological or artistic significance which need to be protected as ancient monument by respondents on government spending.
तेलंगाना में सरकारी परामर्श सेवाओं पर सेवा कर
मामले की सामान्य जानकारी: मामले का नाम: श्री रंगा रेड्डी बनाम पी सी सी टी- हैदराबाद- जीएसटी आदेश की तिथि: 5 दिसंबर, 2025 मामला संख्या: अपील संख्या ST/30239/2025 न्यायालय का नाम: सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (CESTAT), हैदराबाद मूल मामला: यह अपील सीमा शुल्क और केंद्रीय कर आयुक्त (अपील-I), हैदराबाद द्वारा […]
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 31
यह विस्तृत विश्लेषण सिद्ध करता है कि 1871 का यह अधिनियम अब अप्रासंगिक और दमनकारी हो चुका है। इसे पूरी तरह निरस्त कर एक ऐसे नए "एकीकृत पशु कल्याण और अतिचार प्रबंधन अधिनियम" की आवश्यकता है जो पशुओं को "राजस्व की वस्तु" नहीं, बल्कि "जीवंत प्राणी" माने, किसानों और पशुपालकों के हितों में संतुलन बनाए एवं भारतीय पंचायती राज और डिजिटल इंडिया की सोच को आत्मसात करे।
डिजिटल अंधेरा: भारत की आत्मा पर हमला
आपका मासूम बच्चा, जो स्कूल से लौटकर आपका फोन खोलता है, और अचानक उसके सामने ऐसी सामग्री आ जाती है जो उसके कोमल मन को हमेशा के लिए बदल देती है। क्या आपने कभी सोचा है कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स या यूट्यूब जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म भारत को एक डिजिटल यौन बाजार में क्यों बदल रहे हैं?
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 30
मुजरा करने का सिद्धांत कानूनी रूप से सही है क्योंकि यह किसी को दोहरी क्षतिपूर्ति मिलने से रोकता है। हालाँकि, यह प्रावधान औपनिवेशिक व्यवस्था की उस नीति को दर्शाता है जो राजस्व और पैसे के प्रवाह पर पूर्ण नियंत्रण चाहती थी, खासकर तब जब पैसा राज्य के नियंत्रण वाले कोष से बाहर जा रहा हो। यह मुजरा करने की प्रक्रिया गरीब किसान पर यह साबित करने का बोझ डालती थी कि उसे मजिस्ट्रेट से पहले कोई मुआवजा मिला है या नहीं, जिससे सिविल वाद की कार्यवाही और जटिल हो जाती थी।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 28
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 28 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने "न्याय" को मजिस्ट्रेट के विवेक की बेड़ियों में जकड़ रखा था। यह धारा दिखाती है कि नुकसान की भरपाई करना शासन की प्राथमिकता नहीं थी, बल्कि यह केवल एक विकल्प (option) था जिसे मजिस्ट्रेट अपनी मर्जी से चुन सकता था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 27
रखवाले के विरुद्ध शिकायतों की जांच का अधिकार स्थानीय निकाय को दिया जाना चाहिए। स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की "पशु कल्याण समिति" को रखवाले के कार्यों का साप्ताहिक ऑडिट करने और लापरवाही पाए जाने पर तुरंत दंड प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिए। स्थानीय निगरानी से जवाबदेही बढ़ेगी। ऑडिट एवं जांच के बाद स्थानीय निकाय जो भी निर्णय दे भले ही उसके लिए अपील के अधिकार कांजी हौस के कर्मचारियों को दिए जाने चाहिए।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 25
यह वसूली तीन शर्तों में से किसी के भी तहत की जा सकती थी। पहली चाहे पशुओं को अतिचार करते हुए मौके पर ही ज़ब्त किया गया हो या नहीं; दूसरी चाहे पशु अपराध के लिए सिद्धदोष (दोषी पाए गए) व्यक्ति की संपत्ति हों और तीसरी शर्त चाहे अतिचार किए जाने के समय वे पशु दोषी व्यक्ति के भारसाधीन ही क्यों न हों। इस प्रावधान में ब्रिटिश नीति का प्रभाव कठोर और प्रतिशोधात्मक वित्तीय दण्ड थोपने में और न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार करके राजस्व वसूली को प्राथमिकता देने में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
