मालिक यह भी घोषणा करता था कि वह जल्द ही इस अवैध ज़ब्ती के संबंध में धारा 20 के तहत कानूनी शिकायत (परिवाद) दर्ज करने वाला है। मालिक को न केवल निक्षेप जमा करना था, बल्कि यह घोषणा भी करनी थी कि वह धारा 20 के तहत शिकायत दर्ज करने वाला है। यह कानूनी औपचारिकता अनपढ़ या कम जानकार भारतीय मालिकों के लिए भ्रम पैदा करती थी। निक्षेप जमा करने के बाद, मालिक को कानूनी शिकायत दर्ज करने, अदालत में भाग लेने और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए समय और पैसा खर्च करना पड़ता था। यह लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया गरीब किसानों को अक्सर डरा देती थी, और वे न्याय पाने के बजाय निक्षेप राशि को ही गंवाकर चुपचाप बैठ जाना पसंद करते थे।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 14
ब्रिटिश काल में 'डौंडी पिटवाकर' घोषणा करना और मात्र 14 दिनों में पशु बेच देना एक दमनकारी तंत्र था। यह नीति खानाबदोश और गरीब समुदायों को जानबूझकर अपनी संपत्ति से हाथ धोने पर मजबूर करती थी। नए अधिनियम में इस 'समय-बद्ध लूट' को समाप्त कर 'पुनर्वास और स्वामित्व' की नीति अपनानी चाहिए, जहाँ प्राथमिकता पशु को उसके मालिक तक पहुँचाने की हो, न कि उसे बेचने की। अगर पशुओं के टैग करने की विधि नियमित हो जाती हैं तो यह काम और जल्द हो सकता हैं।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 13
आजकल विदेशी नस्ल के कुत्ते बिल्ली पालने का फैशन हैं, जिनका रखरखाव करने के लिए उच्च कोटी की विलासिता लगती हैं और विदेशी ब्रांड का ही खाना लगता हैं। सरकारी कांजी हौस मे ऐसे पशुओं की देखभाल के लिए विशेष प्रबंधन करना पड़ता हैं जिसका खर्च बहुत अधिक होता हैं। इसीलिए इस प्रावधान मे विदेशी नस्ल के पालतू पशुओं के लिए अलग से प्रावधान हो जो व्यवस्था के साथ ज्यादा से ज्यादा जुर्माना वसूल कर सके। कई विदेशी नस्ल के पशु भारत के वातावरण को अपना नहीं पाते हैं इसीलिए हिंसक हो जाते हैं और यह एक तरह की पशु क्रूरता फैशन के नाम पर आजकल भारत के शहरी क्षेत्रों मे बढ़ती जा रही हैं।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 12
शहरी क्षेत्रों में जुर्माने की दरें पशु द्वारा पहुंचाई गई शारीरिक चोट या सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति के नुकसान के आधार पर होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे लघु और सीमांत किसानों की आर्थिक क्षमता के अनुरूप रखा जाना चाहिए। आवासीय क्षेत्रों में पालतू जानवरों द्वारा गंदगी फैलाने या हमला करने के लिए अलग और स्पष्ट जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए। अगर आवारा पशु के अतिचार के कारण नुकसान या चोट लगी हो तो ऐसे आवारा पशु को तुरंत जब्त कर कांजी हौस मे रखा जाए, उसके बर्ताव का अध्ययन कर उसे उचित चिकित्सा दी जाए।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 11
यह धारा सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करती है, यह परिभाषित करती है कि किन सरकारी संपत्तियों को अतिचार से सुरक्षित रखा जाना है और कौन से अधिकारी अतिचार करने वाले पशुओं को ज़ब्त कर सकते थे। महत्वपूर्ण सार्वजनिक निर्माण मे शामिल थे, सार्वजनिक सड़कें, आमोद-प्रमोद स्थल (पार्क), नहरें, जल-निकास के कार्य (ड्रेनेज), बाँध, साथ ही, इन सड़कों, नहरों या बाँधों के किनारे या ढलान (Sides or Slopes) को भी सुरक्षा प्रदान की गई थी। अतिचार करने वाले या भटकते हुए पाए गए पशुओं को पकड़ने का अधिकार इन सड़कों, नहरों, बाँधों आदि के भारसाधक व्यक्ति, यानी, वे अधिकारी जो उनके रखरखाव और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार थे और पुलिस के अधिकारी को दिया गया था। ज़ब्त किए गए पशुओं को पकड़ने वाले अधिकारी को चौबीस घंटे के भीतर उन्हें निकटतम कांजी हौस को भेजना या भिजवाना अनिवार्य था।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 10
3. पुलिस की सुधारात्मक भूमिका: पुलिस केवल तभी हस्तक्षेप करेगी जब पशु के साथ क्रूरता की जा रही हो या जान-माल का खतरा हो। पुलिस का कार्य किसी एक पक्ष को संरक्षण देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि पशु को सुरक्षित और मानवीय तरीके से आश्रय केंद्र तक पहुँचाया जाए। अगर पालतू पशु हिंसक बन गया हो तो भी अन्य लोगों की सुरक्षा के लिए पुलिस का हस्तक्षेप होना चाहिए।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 10
3. पुलिस की सुधारात्मक भूमिका: पुलिस केवल तभी हस्तक्षेप करेगी जब पशु के साथ क्रूरता की जा रही हो या जान-माल का खतरा हो। पुलिस का कार्य किसी एक पक्ष को संरक्षण देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि पशु को सुरक्षित और मानवीय तरीके से आश्रय केंद्र तक पहुँचाया जाए। अगर पालतू पशु हिंसक बन गया हो तो भी अन्य लोगों की सुरक्षा के लिए पुलिस का हस्तक्षेप होना चाहिए।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 9
2. समय-बद्ध सूचना और मुक्ति: पशु के केंद्र में आने के ६ घंटे के भीतर यदि मालिक की पहचान हो जाती है, तो उसे सूचित किया जाना अनिवार्य होगा। यदि मालिक आर्थिक रूप से असमर्थ है, तो उसे 'किस्त' (Installments) में भुगतान करने या सामुदायिक सेवा के बदले पशु ले जाने का विकल्प दिया जाए, ताकि वह अपने आजीविका के साधन से हाथ न धोए।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 8
1. तत्काल पशु राहत (First Aid and Fodder): किसी भी पशु के केंद्र में प्रवेश करते ही, रिकॉर्ड दर्ज करने से पहले, रखवाला उसे पानी और चारा उपलब्ध कराए। यदि पशु घायल है, तो तुरंत पशु चिकित्सक को सूचित किया जाए। पशु चिकित्सक को भी सूचना मिलते ही जल्द से जल्द पोहोचने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 7
3. सूचना का अधिकार: ब्रिटिश काल में ये रजिस्टर गुप्त रखे जाते थे ताकि पशुपालक को अपनी स्थिति का पता न चले। अब इन सभी रिकॉर्ड्स को सार्वजनिक और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। अगर पूरी फाइल किसी मामले की चाहिए हो तो उसे सूचना के अधिकार की अर्जी देकर प्राप्त करने के प्रावधान भी लिखे जाने चाहिए।
