पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 21

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 21

मजिस्ट्रेट, जो औपनिवेशिक तंत्र का अधिकारी था, अक्सर गरीब किसान या पशुपालक की शिकायत पर आसानी से विश्वास नहीं करता था। शिकायतकर्ता को अपनी बात को कानूनी रूप से साबित करने के लिए तुरंत गवाहों और सबूतों की आवश्यकता होती थी, जबकि विरोध पक्ष (अभिग्रहणकर्ता) अक्सर स्थानीय ज़मींदार या प्रभावशाली व्यक्ति होता था। इस प्रक्रिया ने गरीब भारतीय शिकायतकर्ता को शुरुआत से ही कमजोर और अविश्वसनीय स्थिति में डाल दिया।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 20

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 20

ग्रामीण भारत में, जहाँ संचार और परिवहन सीमित थे, और जहाँ पशुपालक अक्सर दूर-दराज के क्षेत्रों में होते थे, उनके लिए ज़ब्ती के बारे में जानना, पैसा जुटाना, और फिर मजिस्ट्रेट के कार्यालय तक पहुँचकर कानूनी शिकायत दर्ज करना, विशेषकर दस दिन के भीतर, लगभग असंभव था। उस समय अक्सर लोगों को पैदल चलना पड़ता था और निरक्षरता के कारण कई मामलों के बारे मे कहा शिकायत करना यह भी पता नहीं होता था।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 19

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 19

यदि मालिक को लगता था कि उसकी ज़ब्ती अवैध है, तो उसे अपनी आजीविका के साधन को बचाने के लिए कांजी हौस रखवाले के साथ बहस करने के बजाय महँगे और समय लेने वाले मजिस्ट्रेट या सिविल न्यायालय के पास जाना पड़ता था। इस नीति ने स्थानीय विवादों के निपटारे को केंद्रीकृत और औपनिवेशिक अदालती व्यवस्था तक सीमित कर दिया। यह गरीब और अनपढ़ भारतीयों को अदालतों के भय और खर्च के कारण न्याय की मांग छोड़ने के लिए मजबूर करता था, जिससे वे प्रशासनिक अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस खो देते थे।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 17

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 17

धारा 16 (विक्रय द्वारा) के तहत वसूले गए प्रभार और धारा 13 (मालिक द्वारा छुड़ाए जाने पर) के तहत प्राप्त की गई राशि, दोनों ही कांजी हौस रखवाले को दे दी जाती थी। यह रखवाले के उस खर्च की भरपाई थी जो उसने पशुओं को खिलाने-पिलाने पर किया था। भले ही रखवाले को खिलाने का खर्च वापस मिल जाता था, लेकिन उसे यह पैसा मालिक से नहीं, बल्कि एक औपचारिक सरकारी प्रक्रिया (धारा 16) के माध्यम से मिलता था। इससे रखवाले की निर्भरता और जवाबदेही पूरी तरह से सरकारी तंत्र पर बनी रहती थी।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 17

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 17

धारा 16 (विक्रय द्वारा) के तहत वसूले गए प्रभार और धारा 13 (मालिक द्वारा छुड़ाए जाने पर) के तहत प्राप्त की गई राशि, दोनों ही कांजी हौस रखवाले को दे दी जाती थी। यह रखवाले के उस खर्च की भरपाई थी जो उसने पशुओं को खिलाने-पिलाने पर किया था। भले ही रखवाले को खिलाने का खर्च वापस मिल जाता था, लेकिन उसे यह पैसा मालिक से नहीं, बल्कि एक औपचारिक सरकारी प्रक्रिया (धारा 16) के माध्यम से मिलता था। इससे रखवाले की निर्भरता और जवाबदेही पूरी तरह से सरकारी तंत्र पर बनी रहती थी।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 16

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 16

ब्रिटिश काल में नीलामी की यह प्रक्रिया केवल सरकारी राजस्व की शत-प्रतिशत वसूली सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई थी। इसमें पशुपालक की आजीविका उजड़ने का कोई दुख नहीं था। नए अधिनियम में "राजस्व सर्वोपरि" की इस क्रूर नीति को समाप्त कर "आजीविका संरक्षण" की नीति अपनानी चाहिए। नीलामी केवल तभी की जाए जब पशु का कोई स्वामी न मिले या वह पशु को रखने से लिखित रूप में मना कर दे। किसी भी परिस्थिति में किसान के आय के मुख्य स्रोत को केवल छोटे जुर्माने के लिए नीलाम नहीं किया जाना चाहिए।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 15

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 15

मालिक यह भी घोषणा करता था कि वह जल्द ही इस अवैध ज़ब्ती के संबंध में धारा 20 के तहत कानूनी शिकायत (परिवाद) दर्ज करने वाला है। मालिक को न केवल निक्षेप जमा करना था, बल्कि यह घोषणा भी करनी थी कि वह धारा 20 के तहत शिकायत दर्ज करने वाला है। यह कानूनी औपचारिकता अनपढ़ या कम जानकार भारतीय मालिकों के लिए भ्रम पैदा करती थी। निक्षेप जमा करने के बाद, मालिक को कानूनी शिकायत दर्ज करने, अदालत में भाग लेने और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए समय और पैसा खर्च करना पड़ता था। यह लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया गरीब किसानों को अक्सर डरा देती थी, और वे न्याय पाने के बजाय निक्षेप राशि को ही गंवाकर चुपचाप बैठ जाना पसंद करते थे।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 14

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 14

ब्रिटिश काल में 'डौंडी पिटवाकर' घोषणा करना और मात्र 14 दिनों में पशु बेच देना एक दमनकारी तंत्र था। यह नीति खानाबदोश और गरीब समुदायों को जानबूझकर अपनी संपत्ति से हाथ धोने पर मजबूर करती थी। नए अधिनियम में इस 'समय-बद्ध लूट' को समाप्त कर 'पुनर्वास और स्वामित्व' की नीति अपनानी चाहिए, जहाँ प्राथमिकता पशु को उसके मालिक तक पहुँचाने की हो, न कि उसे बेचने की। अगर पशुओं के टैग करने की विधि नियमित हो जाती हैं तो यह काम और जल्द हो सकता हैं।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 13

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 13

आजकल विदेशी नस्ल के कुत्ते बिल्ली पालने का फैशन हैं, जिनका रखरखाव करने के लिए उच्च कोटी की विलासिता लगती हैं और विदेशी ब्रांड का ही खाना लगता हैं। सरकारी कांजी हौस मे ऐसे पशुओं की देखभाल के लिए विशेष प्रबंधन करना पड़ता हैं जिसका खर्च बहुत अधिक होता हैं। इसीलिए इस प्रावधान मे विदेशी नस्ल के पालतू पशुओं के लिए अलग से प्रावधान हो जो व्यवस्था के साथ ज्यादा से ज्यादा जुर्माना वसूल कर सके। कई विदेशी नस्ल के पशु भारत के वातावरण को अपना नहीं पाते हैं इसीलिए हिंसक हो जाते हैं और यह एक तरह की पशु क्रूरता फैशन के नाम पर आजकल भारत के शहरी क्षेत्रों मे बढ़ती जा रही हैं।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 12

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 12

शहरी क्षेत्रों में जुर्माने की दरें पशु द्वारा पहुंचाई गई शारीरिक चोट या सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति के नुकसान के आधार पर होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे लघु और सीमांत किसानों की आर्थिक क्षमता के अनुरूप रखा जाना चाहिए। आवासीय क्षेत्रों में पालतू जानवरों द्वारा गंदगी फैलाने या हमला करने के लिए अलग और स्पष्ट जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए। अगर आवारा पशु के अतिचार के कारण नुकसान या चोट लगी हो तो ऐसे आवारा पशु को तुरंत जब्त कर कांजी हौस मे रखा जाए, उसके बर्ताव का अध्ययन कर उसे उचित चिकित्सा दी जाए।

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